(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.70. अध्यायः 070
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति राजनप्रानुवर्णनम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच। 12-70-0x(5501)(67595)
क्तेन वृत्तेन वृत्तक्ष वर्तमानो महीपतिः।
सुखेनार्यान्तुसुखोदर्कानिह च प्रेत्य चाश्नुते॥ 12-70-1(67596)
भीष्म उवाच। 12-70-2x(5502)
इत्थं गुणानां षट्त्रिंशी षट्त्रिंशद्गुणसंयुता।
यान्गुणांस्तु गुणोपेतः कुर्वन्गुणमवाप्नुयात्॥ 12-70-2(67597)
चरेद्धर्मानकटुको मुञ्चेत्स्नेहं न चास्तिकः।
अनृशंसश्चरेदर्थं चरेत्काममनुद्धतः॥ 12-70-3(67598)
प्रियं ब्रूयादकृपणः शूरः स्यादविकत्थनः।
दाता नापात्रवर्षी स्यात्प्रगल्भः स्यादनिष्ठुरः॥ 12-70-4(67599)
संदधीत न चानार्यैर्विगृह्णीयाच्च शत्रुभिः।
नानाप्तैश्चारयेच्चारं कुर्यात्कार्यमपीडया॥ 12-70-5(67600)
अर्थं ब्रूयान्न चासत्सु गुणान्ब्रूयान्न चात्मनः।
आदद्यान्न च साधुभ्यो नासत्पुरुषमाश्रयेत्॥ 12-70-6(67601)
नापरीक्ष्य नयेद्दण्डं न च मन्त्रं प्रकाशयेत्।
विसृजेन्न च लुब्धेभ्यो विश्वसेन्नापकारिषु॥ 12-70-7(67602)
अनीर्षुर्गुप्तदारः स्याच्चोक्षः स्यादघृणी नृपः।
स्त्रियः सेवेत नात्यर्थं मृष्टं भुञ्जीत नाहितम्॥ 12-70-8(67603)
अस्तब्धः पूजयन्मान्यान्गुरून्सेवेदमायया।
अर्चेद्देवानदम्भेन श्रियमिच्छेदकृत्सिताम्॥ 12-70-9(67604)
सेवेत प्रणयं हित्वा दक्षः स्यान्न त्वकालवित्।
सान्त्वयेन्न च मोक्षाय अनुगृह्णन्न चाक्षिपेत्॥ 12-70-10(67605)
प्रहरेन्न त्वविज्ञाय हत्वा शत्रून्न शोचयेत्।
क्रोधं कुर्यान्न चाकस्मान्मृदुः स्यान्नापकारिषु॥ 12-70-11(67606)
एवं चरस्व राज्यस्थो यदि श्रेय इहेच्छसि।
अतोऽन्यथा नरपतिर्भयमृच्छत्यनुत्तमम्॥ 12-70-12(67607)
इति सर्वान्गुणानेतान्यथोक्तान्योऽनुवर्तते।
अनुभूयेह भद्राणि प्रेत्य स्वर्गे महीयते॥ 12-70-13(67608)
वैशम्पायन उवाच। 12-70-14x(5503)
12-70-14(67609)
इदं वचः शान्तनवस्य शुश्रुवा
न्युधिष्ठिरः पार्थिवमुख्यसंवृतः।
तदा ववन्दे च पितामहं नृपो
यथोक्तमेतच्च चकार बुद्धिमान्॥
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-70-2 षट्त्रिंशी षट्त्रिंशत्संख्याका॥ 12-70-5 विगृह्णीयान्न बन्धुभिः। नाभक्तं चारयेच्चारं इति झ. पाठः। तत्र अभक्तं अल्पान्नं इत्यर्थः॥ 12-70-8 चोक्षः शुद्धः॥ 12-70-11 न शोचयेत् शत्रुबन्धूनां शोकं अपनुदेत्॥ 12-70-12 अनुत्तमं महत्तरम्॥


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